उधार का लिफाफा - कंटाप कहानी

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शनिवार, 5 सितंबर 2020

उधार का लिफाफा


उधार का लिफाफा


वह मोहल्ले भर के लोगों के बिजली पानी टेलीफोन के बिल भरता और बाज़ार से सामान ला देता था। हर परिवार से उसे 100 रुपये प्रतिमाह मिलता था, जिससे वह अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहा था। 


एक दिन उदासी समेटे मेरे पास आया और बोला, “साहब, मेरा बच्चा सीरियस है। उसके उपचार के लिये मुझे पाँच सौ रुपयों की जरूरत है। दो-तीन माह में आपको लौटा दूँगा।” मैंने उसे पाँच सौ रुपये दे दिये।


 इसके बाद कई माह तक वह नहीं आया। उसके प्रति की गयी दया के प्रति मैं पछताता रहा और क्रोध को भीतर-ही-भीतर पालता रहा। 


आज मेरे बच्चे का जन्मदिन था। घर में काफी चहल-पहल थी। कुछ मेहमान आ गये थे और कुछ आने वाले बर्थ-डे केक काटने की तैयारी थी, तभी वह झिझकते हुवे घर में प्रवेश किया।


 वह धीरे-धीरे मेरे पास आया और हाथ में पकड़े लिफाफे को मुझे थमाते हुए बोला, “बबलू के जन्म दिन पर बहुत-बहुत बधाई हो।” इतने दिनों से जो क्रोध मेरे भीतर चल रहा था, उसका इज़हार करूँ, इसके पहले वह चल पड़ा।


 उसे रोकने के लिए मेरे भीतर बनी ध्वनि अन्दर-ही-अन्दर दफन हो गयी। बर्थ-डे केक कटा, बर्थ-डे गीत गाया गया। मेहमानों ने भोजन किया और अपने-अपने घर रवाना हो गये।


 सभी गिफ्ट टेबल पर पड़े थे, लेकिन उसके द्वारा दिया गया लिफाफा मेरी जेब में था। 


मैंने लिफाफा खोला, उसमें 601 रुपये और छोटा-सा पत्र निकला। पत्र में लिखा था कि मैं अपने बच्चे को बचा नहीं पाया, इसलिए शहर छोड अपने कस्बे चला गया। यंहा मैंने अखबार बेचने का काम किया। मैं शर्मिन्दा हूँ कि जाते समय आपसे मिल नहीं पाया। मुझे बबलू के जन्मदिन की तारीख याद थी, इसलिये आपसे मिलने के लिए मैंने यह शुभ दिन चुना। पाँच सौ रुपये उधार वाले और 101 रुपये बबलू के जन्मदिन पर उपहार के लिए...स्वीकार कीजिए!


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