कलम और मच्छर - कंटाप कहानी

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गुरुवार, 3 सितंबर 2020

कलम और मच्छर


कलम और मच्छर



आज मेरी कलम पर
एक मच्छर बैठा
वह बिना ख़ून का जीव
मेरी उंगलियों से कुछ यूं ऐठा।

जैसे वह कह रहा हो,
तेरे अन्दर का ख़ून, सिर्फ है 
मुझे चूसने के लिए। बाकि

कलम को तो मै दबाऊंगा!

पर मै नहीं माना, और
लिखता रहा

सहसा कुछ उसी प्रजाति के
लोग,
मेरे कान के पास आकर
भिनभिनाने लगे।

जैसे से वे कह रहें हो
वे तो तुम्हें रात में सोने नहीं देते,
हम तुम्हारी पूरी जिंदगी
की चैन उड़ा देंगे।

कलम को तो हम
दबाएंगे।

अचानक, एक ने मेरे हाथ में
काटा।

ऐसा लगा, वह मुझे 
चेतावनी दे रहा है
और कह रहा हो, कि
जो भी हम कहते हैं, चुपचाप
करता जा
जैसे भी हम यहां राज करते हैं,
उसका थोड़ा मज़ा तू भी
लेता जा।
नहीं तो इस समाज में
रहने नहीं देंगे।

बाकी, कलम को तो 
हम देख लेंगे!

इन बातों को सुनकर मैं
चौंक गया।
और सोचने लगा कि
लोकतंत्र में तो जनता शासन करती है,
यहां तो मच्छर कर रहें हैं।

✍️✍️  राकेश


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