कहानी साहसी गुलाबी गैंग की.. - कंटाप कहानी

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रविवार, 11 अक्टूबर 2020

कहानी साहसी गुलाबी गैंग की..


आज ११ अक्टूबर को गुलाबी गैंग की कमांडर संपत पाल जी का जन्मदिन है।उनकी जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं...



एक दुबली-पतली सांवली सी औरत जिसकी उम्र लगभग 64 वर्ष हो और उसके बारे में यह पता चले कि वह एक ऐसे संगठन को संचालित कर रही है जिसका नाम भी अपने आप में अनूठा है- 'गुलाबी गैंग' तो चकित रह जाना स्वाभाविक है!


यह दास्तां है गुलाबी गैंग...

गुलाबी गैंग की लीडर संपत पाल का जन्म 1960 में बांदा के एक गरीब परिवार में हुआ। 12 साल की उम्र में उनकी एक सब्जी बेचनेवाले से शादी कर दी गई। चित्रकूट के रॉलीपुर में अपने ससुराल में संपत की शुरुआती जिंदगी खासी मुश्किलों भरी रही। अपने घर से गांव के एक अछूत जाति (दलित) के परिवार को पीने के लिए पानी देने की घटना ने संपत के जीवन को पूरी तरह से बदल कर रख दिया। इस घटना की संपत को भारी कीमत चुकानी पड़ी। गांव की पंचायत ने उन्हें गांव से बाहर कर दिया। संपत गांव छोड़कर परिवार के साथ बांदा के कैरी गांव में बस गई।  


गुलाबी गैंग का नाम उनकी और उनके साथियों की गुलाबी रंग की साड़ी की वजह से पड़ा। चित्रकूट जिले की निवासी सम्पत पाल के पति शराबी थे। शादी के बाद ही दारू पीकर घर में मार-पीट और गाली गलौज करना उनका लगभग प्रतिदिन का काम हो गया था। परिवार के सदस्य भी इस शोषण से मुक्ति के लिये उनकी कोई सहायता नहीं करते थे। 


एक दिन उनके पति दारू के नशे में चूर होकर घर आये और उन्हें गन्दी गन्दी गालियों से नवाजने लगे। उसके बाद मारपीट होनी ही थी। चित्रकूट के आम महिलाओं की तरह ही अशिक्षित संपत पाल के धैर्य का बांध इस बार टूट पड़ा और खाना बना रहीं संपत ने चूल्हे से जलता हुआ एक लकड़ी का एक डंडा निकाला, तब फिर क्या था? ले तड़ातड़ दे तड़ातड़। पति परमेश्वर का नशा ग़ायब हो चुका था, और वो माफ़ी मांगने की मुद्रा में आ चुके थे। 


गांवों में किसी औरत द्वारा अपने पति के पीटने की ख़बर आग से अधिक रफ़्तार से फैलती है। यह भी ऐसे ही फ़ैली। गांव भर की महिलाएं पतियों और बेटों की दारूख़ोरी और उसके बाद की गाली गलौज व मारपीट से परेशान थीं। सम्पत पाल ने सभी महिलाओं को इकट्ठा किया। संपत को ग़ुलाबी रंग की साड़ी बहुत पसंद है। इसका कारण वो बताती हैं कि, "अपेक्षाकृत सस्ते में मिल जाना और उसका चटक रंग उन्हें मोहता था।" संपत ने अपने साथ पहले तो गांव की फ़िर बाद में आस-पास के गांवों की महिलाओं को जोड़ा। गुलाबी साड़ी अन्य महिलाओं की भी पसन्द बन गयी।

इन्होंने एक और अभिनव प्रयोग किया कि अब ये लोग एक डंडा लेकर चलने लगीं, डंडे को गुलाबी रंग से रंग लेतीं। ऐसे में इनके समूह को ग़ुलाबी गैंग के नाम से पुकारा जाने लगा। बाद में 14 फरवरी 2008 को बाकायदे इसी नाम से एक संगठन का रजिस्ट्रेशन करवा लिया गया। इन महिलाओं के डंडे का उपयोग भी गांव, क्षेत्र की समस्याओं के संदर्भ में अक्सर ही प्रमुखता के साथ होता है।




 2012 में चित्रकूट की एक खबर बहुत चर्चा में रही! जिला मुख्यालय, कर्वी के कुछ दूर पर नेशनल हाइवे में गहरे गड्ढे हो गए थे। कई बार शिकायत करने पर जब प्रशासन और सरकार ने कोई कार्यवाही नहीं की और बारिश में गड्ढे भर गए। संपत पाल अपने साथियों के साथ गयीं और पूरे सड़क पर उन्होंने धान की रोपनी करवा दिया। उसके बाद जो होना था वही हुआ। 


संपत पाल कहती हैं कि, "महिलाओं पर बढ़ रहे अत्याचारों के खिलाफ यह संगठन बनाया गया। महिलाओं पर अत्याचार उन्हीं की कमी से बढ़ रहे थे। वे अपने अधिकारों को नहीं पहचानती थी। मां अपनी बेटी को शिक्षा देने के बजाए बेटे को शिक्षित बनाने को प्राथमिकता देती थी। इस संगठन के अस्तित्व में आने के बाद महिलाओं को लड़कियों की शिक्षा के लिए जागरूक किया गया। उनके अधिकारों की भी जानकारी दी गई। जिससे वे आगे बढ़ सकें। इस संगठन में कोई पुरुष नहीं है। इस संगठन के माध्यम से महिलाओं को प्रशिक्षण भी दिया जाता है। जिससे वे अपने अधिकारों को पहचान सके। पीड़ित महिलाओं को गैंग में शामिल करती हैं।"


जन्मदिन पर संपत पाल को बहुत-बहुत बधाई। सामाजिक पुनर्निर्माण के कार्यों के दस्तावेज़ीकरण में लगे हुए समर्पित लोगों से, नारीवादी अध्ययनकर्ताओं व एक्टिविस्टों से अनुरोध है कि ऐसी संपत पाल जैसी अनूठी प्रयोगधर्मी और संघर्षशीलता के नए पैमाने गढ़ने वाली महिलाओं पर केंद्रित रचनायें रचें और शोध को प्रोत्साहित करें।

 

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