हिंदी का पहला विमर्श- बाणभट्ट की कादम्बरी - कंटाप कहानी

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बुधवार, 19 अगस्त 2020

हिंदी का पहला विमर्श- बाणभट्ट की कादम्बरी

 सातवीं सदी की यह रचना सम्पूर्ण हिंदी औऱ संस्कृत साहित्य की मार्गदर्शक है । आज जो विमर्श का प्रचलन जोरों पर है उसका उत्स महाकवि उस समय कर रहे हैं,शुरुआत ही करते हैं चांडालों की बस्ती से । एक ब्राह्मण होते हुए भी ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों के कार्यों पर सवाल उठाते हैं ।"तुम ऊंची जात वालों के भी एक से एक किस्से जानते हैं हमलोग,जिसको पाप समझते हो उसी से लिपटे हुए भी रहते हो" । (एक चांडाल बालिका)

प्रेम ,श्रृंगार, करुणा,आदि नौ रसों का जिक्र किया है उन्होंने । इसे पढ़ते हुए अचानक से कभी वात्सल्य से आंख छलछला गयी तो कभी क्रोध से होंठ भींच गए,तो कभी हल्की सी मुस्कान तैर गई ।
साहित्य में रुचि रखने वाले हरेक विद्यार्थी हो इससे जरूर रूबरू होना चाहिए किंतु यह साधारण मनुष्य के लिए अगम्य है ।
"बाणोंच्छिष्टम जगत सर्वमं"
बाण ने किसी वस्तु को छोड़ा नहीं ,महाकवि ने जो खा कर (लिखकर) छोड़ दिया उसी में पूरा विश्व समाहित है ।

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