"फागुन के भीर अभीरन तें गहि, गोविंदै लै गई भीतर गोरी ।
भाय करी मन की पदमाकर, ऊपर नाय अबीर की झोरी ॥छीन पितंबर कंमर तें, सु बिदा दई मोड़ि कपोलन रोरी ।
नैन नचाई, कह्यौ मुसक्याइ, लला ! फिर खेलन आइयो होरी" ॥
पंक्तियां प्रख्यात रीतिबद्ध कवि पद्माकर की है, जिसमें उन्होंने संयोग श्रृंगार रस का प्रयोग करते हुए गोपियों और श्रीकृष्ण के बीच फागुन के दौरान हंसी ठिठोली का बड़ा ही मनोहारी वर्णन किया है।
कवि कहते हैं कि होली खेलन के दौरान कन्हैया गोरी को अपने अभीरों की टोली के संग कमरे के भीतर ले जातें हैं।
अबीर गुलाल का प्रयोग करते हुए श्याम गोपियों के गालों और होठों को भींचते हैं।
आनंद अनुभूति में डूबे दोनों मुस्कुरा रहें हैं, कन्हैया फिर होली खेलन आ रहे हैं।

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