साइकिल और बचपन - कंटाप कहानी

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गुरुवार, 10 सितंबर 2020

साइकिल और बचपन

 

साइकिल और बचपन


हमारे जमाने में साइकिल तीन चरणों में सीखी जाती थी, 


पहला चरण   -   #कैंची (हाफ पैंडिल)


दूसरा चरण    -   #डंडा (फुल पैंडील)


तीसरा चरण   -   #गद्दी ( सीट पर से)

एक चौथा चरण भी था! जिसमें साइकिल पटककर रोकने के बजाय पैर से रोका जाता था!




तब साइकिल चलाना इतना आसान नहीं था क्योंकि तब घर में साइकिल बस पापा या चाचा चलाया करते थे! जो बिना बिना पुछे साइकिल निकाल लेने पर कुटते भी थे!

तब साइकिल की ऊंचाई 24 इंच हुआ करती थी जो खड़े होने पर हमारे कंधे के बराबर आती थी ऐसी साइकिल से गद्दी चलाना मुनासिब नहीं होता था। तब साइकिल साफ करने के भी चचा पैसा दिया करते थे!


#कैंची" वो कला होती थी जहां हम साइकिल के फ़्रेम में बने त्रिकोण के बीच घुस कर दोनो पैरों को दोनो पैडल पर रख कर चलाते थे।


और जब हम ऐसे चलाते थे तो अपना सीना तान कर टेढ़ा होकर हैंडिल के पीछे से चेहरा बाहर निकाल लेते थे, और "क्लींङ क्लींङ" करके घंटी इसलिए बजाते थे! तभी भी नहीं देखते थे तो मुंह से चिल्ला कर बताते थे! देख हम साइकिल सीख गेलियौ😎😎 ताकी लोग हमारी बहादुरी ी देख सकें की लड़का साईकिल दौड़ा रहा है ।


आज की पीढ़ी इस "एडवेंचर" से अनजान है उन्हे नही पता की आठ दस साल की उमर में 24 इंच की साइकिल चलाना "जहाज" उड़ाने जैसा होता था । तब हम साइकिल से ट्रेक्टर का क्मपटिशन करते थे!


हमने ना जाने कितने दफे अपने घुटने और मुंह तोड़वाए है और गज़ब की बात ये है कि तब दर्द भी नही होता था, गिरने के बाद चारो तरफ देख कर चुपचाप खड़े हो जाते थे अपना हाफ कच्छा पोंछते हुए निकल देते थे! 


इन सब के बाद एक चरण आता था! किसी को साइकिल पर बैठा कर चलाने की! और ये पिछे बैठाने वाले हमारे छोटे भाई बहन होते थे! जिसे हजार बार समझा देते थे! पैर को नीचे नहीं लटकाना है! फिर ये बच्चे वही गलती दोहराते थे! और अपना पैर के हवाले कर देते थे! फिर हम साइकिल और बच्चे को छोड़ भाग जाते थे!


अब तकनीकी ने बहुत तरक्क़ी कर ली है पांच साल के होते ही बच्चे साइकिल चलाने लगते हैं वो भी बिना गिरे। दो दो फिट की साइकिल आ गयी है, और बच्चे तो अब सीधे गाड़ी चलाते हैं छोटी छोटी बाइक उपलब्ध हैं बाज़ार में। आज के बच्चों में साइकिल पर से गिरने की निशानी वाला कटा निशाना समाप्त होते जा रहे हैं! हमारा तो साइकिल पर से गिरने वाला निशान आज भी आइडेंटीफिकेशन मार्क के रुप में काम कर रहे हैं!😂😂


मगर आज के बच्चे कभी नहीं समझ पाएंगे कि उस छोटी सी उम्र में बड़ी साइकिल पर संतुलन बनाना जीवन की पहली सीख होती थी!  #जिम्मेदारियों" की पहली कड़ी होती थी जहां आपको यह जिम्मेदारी दे दी जाती थी कि अब आप गेहूं पिसाने लायक हो गये हैं ।

इधर से चक्की तक साइकिल ढुगराते हुए जाइए और उधर से कैंची चलाते हुए घर वापस आइए !


और यकीन मानिए इस जिम्मेदारी को निभाने में खुशियां भी बड़ी गजब की होती थी।


और ये भी सच है की हमारे बाद "  #कैंची " प्रथा विलुप्त हो गयी ! 

हम बदलते समय और समाजिक सांस्कृति को नहीं रोक सकते हैं! हम सिर्फ उन यादों को संजो सकते हैं! अपनी स्मृति को नवीन कर सकते हैं! अगर यह प्रस्तुति अच्छी लगी हो! तो अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ शेयर करके अपनी स्मृति को ताजा करें!

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