बानवट की कथा: लोकतंत्र और राजा - कंटाप कहानी

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शुक्रवार, 28 अगस्त 2020

बानवट की कथा: लोकतंत्र और राजा

            

           "बानवट की कथा"                       




                                                          
"एक राजा था।उसका नाम था 'बानवट'।वह बहुत ही ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ एवम् न्यायप्रिय था।उसके राज्य की सारी प्रजा सुखी और संपन्न थी।प्रजा सुखी हो भी क्यों न! राजा अपनी प्रजा की हर जरूरतों का ख्याल जो रखता था। शायद इसी कारण से उसके राज्य में गरीबी, बेरोजगारी, भूखमरी,बाढ़, सुखाड़ आदि समस्याओं का नामो निशान तक नहीं था।इस कारण से राजा की ख्याति चारो ओर फैली हुई थी।उसकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण था - उसके द्वारा राजकीय सुख सुविधाओं का त्याग,उसका मेहनती और संतुष्ट जीवन।अर्थात् राजा अपने महल में न रहकर (अपनी प्रजा के बीच) एक झोपड़ी में रहता था।राजा रोज सुबह अपनी झोपड़ी से स्नान ध्यान , नाश्ता आदि कर राजमहल अपनी फटी धोती में खाली पैर जाता। वहां पहुंचने के बाद वह सबसे पहले राजशाही पोशाक धारण करता फिर जाकर राजसिंहासन पर विराजमान होता।दिन भर राज्य की गतिवधियों का मुआयना करता, राज्य की समस्याओं आदि का समाधान मंत्रियों के साथ विचार विमर्श कर करता।वैसे उसके राज्य में लोगों के बीच किसी भी प्रकार का सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक तनाव नहीं था इसलिए उसके पास बहुत कम ही न्याय करने संबंधी मुद्दे आते।फिर भी जब कभी राज्य में किन्हीं दो पक्षों के बीच किसी बात पर विवाद हो जाता तो राजा अपनी सुख बुझ से ऐसा न्याय करता कि दोनों पक्ष संतुष्टि पूर्वक अपना मतभेद मिटा लेते।राज काज से निपटने के पश्चात राजा राजकीय पोशाक वहीं महल में उतार कर पुनः अपनी फटी धोती पहन वैसे ही खाली पैर अपनी झोपड़ी में लौट आता।घर आने के पश्चात राजा हाथ मुंह धो कुछ खाने के पश्चात अपनी पत्नी तारावती (कल्पित नाम) के साथ रस्सी कातने बैठ जाता। जी हां!राजा का यही  अपना पेशा था - देर रात तक दोनों   रस्सी कातते और राजा हर रविवार को उसे ले जाकर बाजार में बेच आता और इसी से उसके घर की रोजी-रोटी चलती थी।रस्सी के इस पेशे से राजा को इतनी कम आमदनी होती जिससे उसके और उसकी पत्नी की सिर्फ भोजन की व्यवस्था हो पाती और अन्य जरूरतों (जैसे कपड़े, स्वास्थ्य,आभूषण,बर्तन इत्यादि) की पूर्ति नहीं हो पाती। सारी प्रजा राजा के इस त्याग के सामने नतमस्तक थी।उसने कई बार राजा से आग्रह की थी कि "आप हमारे पिता तुल्य है , और हमारी हर जरूरतों की पूर्ति करते है।हमारी जरूरतों की पूर्ति करने के लिए आप क्यों अपनी सुख सुविधाओं एवम् जरूरतों का दलन क्यों कर रहें हैं? आप आदर सहित राजमहल में सपरिवार निवास करें।और राजकीय सुख सुविधाओं का लाभ उठाएं।"

राजा अपनी प्रजा के इस आग्रह को बड़ी विनम्रता के साथ टाल देता।वह हमेशा अपनी जनता से कहता कि - " राजकीय सुख सुविधाएं हमारी मेहनती और ईमानदार जनता के राजस्व से जुटाई गई है अतः उसपर केवल और केवल उनका ही अधिकार है।और इन सभी राजस्व से जुटाई गई संसाधनों का प्रयोग हमें केवल प्रजा के हित में ही करना चाहिए। मै कोई नीच, स्वार्थी और आलसी इंसान नहीं हूं जो जनता की मेहनत के पैसों पर राज करू।मेरे लिए इस तरह की सुख सुविधा हराम है।"प्रजा ने मुझे राज्य का संचालन भार संभालने लायक समझा। और राज्य संचालन का बागडोर मुझे दिया।मेरा जीवन तो ऐसे ही सार्थक हो गया। इससे बड़ा कोई सुख हो सकता है! 

और मेरा क्या फर्ज़ बनता है!कि मै प्रजा के सुख दुख से दूर बड़े बड़े परकोटे वाले महल में जाकर सुख सुविधा का लाभ उठाऊ! नहीं, एक आदर्श राजा या जनता का सच्चा प्रतिनिधि वही होता है जो जनता के सुख दुख की अनुभूति को महसूस कर सके। और इस सुख दुख की अनुभूति का अहसास करने के लिए उस राजा या जनता के प्रतिनिधि को चाहिए कि वह भी अपने समाज में रह रहे आम लोगों के बीच जाकर रहे। उनकी संस्कृति,भाषा, आचार - विचार, रीति रिवाज, क्रियाकलापो,संघर्षमय जीवन को अपनाए।तब जाकर वह अपने जनता के हित और कल्याण में असली व वास्तविक कदम उठा सकेगा।

राजा के इस स्वाभिमान का कारण थी उसकी पत्नी तारावती जिसने कभी भी राजा के इन निर्णयों का विरोध नहीं किया बल्कि वह उसे जीवन के हर कदम पर प्रोत्साहित करती।तारावती घर का सारा काम काज देखती और सुबह, शाम मुहल्ले की अन्य स्त्रियों के साथ पानी भरने नदी पर जाया करती थीं।बेचारी की स्थिति भी अपने पति की तरह ही साधारण थी अर्थात् उसके पास भी केवल दो पुरानी साड़ी थी।आभूषण के नाम पर केवल पति  के नाम का एक मोतियों का मंगलसूत्र।वह कभी अपने पति से किसी अन्य चीजों की मांग नहीं करती।जबकि वह एक राजा की ही बेटी थी।फिर भी अपनी झोपड़ी में अपने ईमानदार पति के साथ संतुष्ट थी।

एक दिन की बात है - तारावती के मायके से उसकी कुछ सहेलियां उसका राज्य देखने आयी।रानी ने उन सभी को    अपनी झोपड़ी में ले गई और एक चटाई (जो कहीं कहीं फटी थी) बिछा उनसे बैठने का आग्रह किया।तो सभी को झटका लगा कि ये क्या एक राजा की बेटी और एक राजा की पत्नी इस हाल में!रानी ने सब बातें उन्हें विस्तापूर्वक बता दिया।                 

 परन्तु उनमें से कुछ रानी का मज़ाक उड़ाने के लिए उसे ताने मारने लगी:-"क्यों तारा तुम तो कहती थी कि तुम अपने ससुराल में बहुत सुखी और संपन्न हो। तुम्हारे पति अपने राज्य के राजा हैं और तुम रानी। लेकिन मै यहां देखती हूं कि तुम्हारी स्थिति तो एक भिखारी से भी बदतर है।अपने चेहरे को देखो: - देखने से कहीं लगती हो कि तुम एक औरत हो। न तुम्हारे शरीर पर कोई गहने हैं न रानी की मर्यादा लायक कोई पोशाक। इन फटी साड़ी और झुर्रियों से भरे चेहरे में तुम्हे कोई कैसे फलां राज्य की रानी मानेगा।एक औरत का मूल धर्म होता है कि वह अपने पति को खुश करने के लिए अच्छे कपड़े ,गहने आदि पहने और श्रृंगार करे।और रही बात तुम्हारे पति कि तो वे एक मूर्ख इंसान हैं जो अपना और अपने परिवार तक की जीवन को व्यर्थ ही मूर्ख प्रजा के हित में समर्पित करने का संकल्प उठा रखे हैं।प्रजा का क्या है!वह तो ऐसा ही सीधा साधा एक शासक ढूंढ़ता है जो उसे हर तरह से सुरक्षा प्रदान करे एवं उनकी हर जरूरत की पूर्ति करे।वैसे यह मूर्ख और आलसी लोगो का समूह होता है जो अपना विवेक तक का प्रयोग नहीं करता कि उसका प्रतिनिधि (या शासक) क्या गलत कर रहा है और क्या सही! यह कभी अपने शासक से अपना अधिकार डटकर नहीं मांगता। बस चुप चाप समय पर राजस्व चुका, निश्चिंत  हो वह भगवान से अपने राजा की मति जनता की समस्याओं की तरफ करने की मन्नत मांगता रहता है।वह सब कुछ बैठे बैठे ही खोजता है।और प्रजा की इस मूर्खता, अकर्मण्यता एवं निष्क्रियता का फायदा शासक ,उसके चाटुकार मंत्रीगण, गुप्तचर,सेवकगण,राज्य के सेठ साहूकार, जमींदार आदि लोग उठाते हैं।यह वही मूर्ख प्रजा है जिसने झूठी अफवाह फैला मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम एवं उनकी पत्नी सीता तक को नहीं छोड़ा।बताओ राम से भी बड़ा कोई आदर्शवादी शासक हुआ है इतिहास में?  मैं तुमसे एक प्रश्न पूछती हूं कि कुछ वर्षों के बाद जब तुम और तुम्हारे पति बुड्ढे हो जाएंगे तो क्या इन प्रजा में तुमलोगों के लिए वही सम्मान होगा जो आज है?कदापि नहीं! क्योंकि उस वक्त यह प्रजा अपने नए सेवक(शासक) की तलाश कर रही होगी और वह उसका गुणगान करेगी न कि तुम्हारा।देखो न तुम्हारी कोई औलाद भी तो नहीं है जो इस राज्य की जिम्मेवारी संभालेगा।इसलिए मै कहती हू जितने दिन की ज़िंदगी है उतने दिन सुख में बिताओ।यदि तुम्हारे पति को यही जीवन पसंद है, तो कम से कम तुम अपनी स्त्री होने के अस्तित्व को बचाओ।"

तारावती की सहेलियां कटु एवं अल्प यथार्थ उपदेश देकर चली गईं।परन्तु रानी को स्त्री के अस्तित्व वाली बात दिल में लग गई। इधर चार पांच दिनों से वह अपने पति  से उदास एवं तटस्थ रहने लगी थी। उससे न बात करती, न कुछ बोलती।पति जब राज दरबार से लौटता तो दरवाजे पर हाथ मुंह धोने के लिए लोटे में पानी भी नहीं रखती।थाली में भोजन परसकर एक थाल से ढक कर सर सवेरे सो जाती।बेचारा थका मांदा आता तो खुद से खाना लेकर खाता।राजा को यह समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर रानी को अचानक हुआ क्या?विवाह के दिन से लेकर आज तक दोनों में कोई कटुता नहीं हुई।फिर ये अचानक......

राजा अंदर ही अंदर परेशान एवं उदास रहने लगा।परेशान हो न भी क्यों!आखिर उसके जीवन में और था ही कौन!जिससे वह अपनी सुख दुख का जिक्र करता।उसके जीवन रूपी चक्र की पूर्ति तारावती ही तो करने वाली थी।वह उसकी ताकत, गर्व, स्वाभिमान,सब कुछ थी।इतना त्याग करने की क्षमता और निडरता पूर्वक राज्य करने की शक्ति भी तो उसी से मिलती थी।वह जब भी अपनी पत्नी से उसके उदास रहने का कारण पूछता तो वह कोई जवाब नहीं देती।

राजा का कुछ दिनों से राजकाज में मन नहीं लग रहा था।इस बात को मंत्रीगण आदि गौर कर रहे थे। जब उसके मंत्री ने प्रजा इसका कारण जानने की कोशिश की तब उसे पूरी घटना की जानकारी हुई। उसने यह बात जनता के बीच पहुंचा दी, और उनमें से कुछ लोगो को चुनकर राजा को समझाने के लिए भेजा।

मंत्री द्वारा चुने गए लोग राजा के पास जाकर कहते हैं - महाराज, आप तो जानते ही हैं कि एक योग्य  शासक अपने राष्ट्र का मस्तिष्क होता है।जिस प्रकार से जीव एवं मनुष्य के मस्तिष्क का संतुलन बिगड़ने से पूरा शरीर अस्त व्यस्त हो जाता है।उसी प्रकार से एक शासक की किसी तरह की समस्या उस राज्य के लिए अशुभ हो सकती है।पिछले कुछ दिनों से हम देख रहे हैं कि आप कुछ परेशान हैं।...........

और उन प्रतिनिधियों ने राजा को शुरू से लेकर अंत तक की कहानी बता दी।और उसके बाद उन्होंने राजा को मनाना प्रारम्भ कर दिया कि - आप परिवार सहित राजमहल में रहिए।परन्तु राजा मानने वाला कहां था।लेकिन वह इस बात को अच्छी तरह से समझ चुका था कि रानी में भौतिक सुख सुविधाओं के प्रति इच्छा जग चुकी है। सो वह मानेगी नहीं, राजा दुविधा में था।वह नहीं चाहता था कि तुच्छ चीजों की आपूर्ति के लिए वह अपने सिद्धांत से भटक जाए। परन्तु वह इस बात को भी अच्छी तरह से जानता था कि अगर वह पूरा जीवन भी रस्सी कातकर पैसे जुटाए तो भी रानी के लिए उपयुक्त गहने नहीं बनवा पाएगा।

अंत में उन प्रतिनिधियों ने आपस में सलाह मशविरा कर राजा के सामने एक युक्ति रखी कि , हे राज्यश्रेष्ठ, हम जानते हैं कि आप अपना प्रण कभी नहीं तोड़ेंगे।लेकिन हम अपने हित और आपके स्वास्थ्य की चिंता करते हैं।और हम ये भी जानते हैं कि आप हमारी उतनी चिंता करते हैं जितना हम स्वयं की भी नहीं करते होंगे।हम आपसे एक अंतिम आग्रह करते हैं, कृपा करके उसे ठुकराइएगा नहीं।आप महल में चल कर नहीं रहें ,ठीक परन्तु आपके घर को हम एक महल की भांति सजाना चाहते हैं।और हां, आपके और रानी मां के लिए कुछ गहने और कपड़े राजकोष से कर्ज के रूप में दिया जाएगा।इसे स्वीकार करें।धीरे धीरे आप राजकोष में धन लौटाकर आप अपने कर्ज से मुक्त हो जाइएगा और हमारे राज्य की गरिमा भी बनी रहेगी।

अंत में राजा बानवट को प्रजा की ही बात माननी पड़ी।परन्तु उसने राजकोष से केवल रानी के लिए ही कपड़े और गहने कर्ज़ स्वरूप लिए।और लोगो से कहा कि कृपया वे उसकी झोपड़ी को महल न बनाए, नहीं तो उनका यह कदम राजा को उसकी प्रजा से दूर करने का पहला कदम होगा।

प्रजा इस शर्त को मान गई।और उधर राजा जब घर पर रानी को राजकीय पोशाक और गहने दिए तो वह खुश हो गई।और धीरे धीरे उनके घर की खुशियां लौटने लगी।परन्तु रानी अब राजा का पहले जैसा ध्यान नहीं रखती वह दिन रात आइने के सामने  श्रृंगार करती और खुद को निहारती रहती।

कुछ दिनों के बाद, एक दिन राजा राजदरबार से लौटा तो बहुत थका हुआ महसूस कर रहा था।घर आते ही वह दरवाजे पर गिर पड़ा और रानी से पानी मांगने लगा।लेकिन रानी तो अपने श्रृंगार कार्य में इतनी  लीन थी कि उसे उसके पति के आने तक की खबर नहीं रही।राजा बहुत देर तक दरवाजे पर पड़े पड़े ही पानी मांगता रहा परन्तु रानी उसकी आवाज़ नहीं सुन सकी।बहुत देर के बाद और अधिक रात होने के बाद अचानक रानी को राजा का ख्याल आया तो वह दरवाजे के तरफ बढ़ी।दरवाजे पर पहुंची तो उसका पति बेसुध पड़ा हुआ था और हल्की आवाज़(बुदबुदाहट वाली आवाज़)में पानी पानी कर रहा था।रानी ने जब राजा के माथे को छुआ तो झटके से उसने अपना हाथ पीछे कर लिया , उसका सर तबे की तरह लहक रहा था।रानी दौड़कर रसोई घर में जाती है पानी लाने, लेकिन वहां एक बूंद पानी नहीं होता। आज रानी शाम को पानी लाने नदी नहीं गई थी अपने श्रृंगार के कारण।वह एक बर्तन उठा नदी के तरफ दौड़ने लगती है।भारी वस्त्र एवं गहनों के कारण वह चल भी नहीं पा रही थी। जैसे ही उसने नदी में बर्तन डुबाया, नदी में एक राक्षसनी का चेहरा नजर आया।वह डर गई और बिना पानी लिए घर के तरफ भागने भागी, जब वह घर पहुंची तो अपने पति को देख कर ठिठक गई।वह अब भी पानी पानी कर रहा था और उसकी हालत पहले से भी नाज़ुक दिख रही थी।वह फिर से नदी की ओर दौड़ती है,  जैसे ही उसने नदी में बर्तन को डुबाया और नदी में उसकी नजर अपने प्रतिबिंब पर पड़ी फिर वही भयानक चेहरा उसे नजर आया।वह फिर से बिना पानी भरे ही भाग खड़ी हुई।कुछ दूर तक दौड़ने के बाद उसे अपने पति कि हालत याद आयी, वह अब वही पर खड़ी होकर रोने लगी। कुछ देर रोते रोते, उसे न जाने क्या सूझी, उसने जल्दी जल्दी, अपने गहने जेवर उतार कर फेकने लगी।सारे गहने फेकने के बाद वह फिर से नदी पर पहुंचीं।अब उसका चेहरा नदी के जल में साफ साफ नजर आ रहा था।

वह जल्दी जल्दी नदी का जल बर्तन में भरा और दौड़ती हुई घर को भागी। अचानक उसे ठोकर लगी और वह जमीन पर गिर पड़ी।बर्तन भी हाथ से छूटकर गिर गया और उसमें से जल बहने लगा।उसने जल्दी से उठकर बर्तन को उठाया।उसमे अब मात्र लगभग 3-4 चुल्लू पानी बच रहा होगा।बेचारी उतने ही पानी को जैसे तैसे सम्हालकर घर पहुंचती है।आते ही उसने देखा कि उसका पति अब पानी नहीं मांग रहा है।जब उसने उसे जगाने के लिए उसका हाथ पकड़ा तो उसे एक झटका लगा और वह वही पर बेहोश हो कर लुढ़क गई।

क्योंकि उसके पति का हाथ पूरी तरह ठंडा हो चुका था और नब्ज भी रुक चुका था।.......     

                                     (मूल कथा से प्रेरित)

1 टिप्पणी:

  1. कृप्या इस कथा में तारावती को उसके पति अर्थात् राजा की मृत्यु का जिम्मेदार ना समझा जाए।वह तो बस अपनी सहेलियों द्वारा उस समय के भौतिकवादी जाल में उलझायी गई।

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